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शोभावती / शंकर्षण परिड़ा

रचनाकार:  शंकर्षण परिड़ा (1961) जन्मस्थान:  इंद्रप्रस्थ,सर्वोदयनगर, पुरी कविता संग्रह:  माया-मंच(1995), शब्द-दर्पण (2005), अँग्रेजी अनुवाद (वायस ऑफ मिरर) (2010), चित्राक्षर (2011) मैं जानता हूँ मेरी आँखें नहीं है फिर भी मुझे दिखाई पड़ रहा है तुम्हारा सौन्दर्य और गुणवत्ता का अक्षुण्ण नारीत्व ! शोभावती दृश्य ! मेरे कान नहीं है फिर भी मुझे सुनाई पड़ रही हैं  तुम्हारे आवेग और उन्माद में तल्लीन और तन्मयमिश्रित तान तुम्हारे प्रणय राग के ललित मधुर स्वरों का आरोहण- अवरोहण। वास्तव में मेरा मुँह नहीं है मगर उच्चारण कर सकता हूँ ललित लवंग लता प्रिय प्रियतम निशब्द कविता बिना होठों के स्पर्श करता हूँ  तुम्हारी भीगी पलकों को बिना कंठ के गा सकता हूँ आँसू की गजल, खून की कविता मेरे पाँव नहीं है फिर भी कह नहीं पाऊँगा अच्छा होता अगर मेरे पक्षियों जैसे पंख लग जाते मैं तो योजन- योजन घूम सकता हूँ मैं तो तुम्हारा तन- मन स्पर्श कर सकता हूँ मैं शोभावती प्रियतमा को समझ सकता हूँ तुम्हारी निर्नाद नीरवता और मन्द मधुर सम्मोहन। मेरे हाथ नहीं है फिर भी तुमको पकड़ सकता हूँ ...

बाबनाभूत / गजानन मिश्र

रचनाकार:  गजानन मिश्र जन्मस्थान:  तपोवन, टिटिलागढ़,बोलांगीर कविता संग्रह:  सर्वनाम,नथिबा चित्र,स्टेशन,कविताघर,गोटापणे,चेरैवेति,बाहुड़ा,काल काल,नाब,अमृत सबु,अहर्निशि, महारेखा सर्वत्र घूमता है। कहाँ रहेगा ? किसके घर में ? योजन- योजन दूर से चंद्र और सूर्य को निरखते बैठे रहता है बरगद के पेड़ के फैले अंधेरे में या सेमल-पेड़ के लाल- लाल फूल लेकर अन्दर आता है वह ईमली-पेड़ की टहनी से सीखाना होगा उसे उचित व्यवहार किसका घर ? मंदिर की पताका ? समुद्री ज्वार-भाटा  ? धूल धुसरित होकर वापस रास्ते के बीच में खड़ा है बंधु परिजनों से मिलकर कहने के लिए जीवन का भग्नांश बल्कि उस समय नहीं था, न होगा क्रियाकर्म करके इधर -उधर लौट जाता है कहीं वह सर्वप्रथम और सर्वशेष राष्ट्रदूत की तरह । उसका कोई और परिचय नहीं है . युद्ध-समाप्ति के भग्नावशेष में खोजता है वह स्नेह, प्रेम भाव का अपूर्व मिश्रण शत्रु-मित्र का . शून्य आकाश किसलिए बुलाता है मुसकराते हुए जब तक नया जीवन रहेगा हरे संकेत लेकर धीमे पांवों से चलता है वह मिट्टी में आगे-आगे । पड़ी हुई हरी घास रख पाएगी मखमली क...

घर, घर नहीं रहा / उदय नाथ बेहेरा

रचनाकार:  उदय नाथ बेहेरा (1954) जन्मस्थान:  कंटिओ,ढेंकानाल कविता संग्रह:  ओड़िया-भाषा की स्थानीय पत्र–पत्रिकाओं में कविताएं प्रकाशित ठीक था, ऊँट तंबू के बाहर था अंदर आते ही उँगली पकड़कर पनहुचा पकड़ लिया तंबू तो गया, सब कुछ बरबाद भी हो गया अंदर के लोगों के सर पर, आसमान छत बन गया । ठीक था, घर खाली था सोचा था समान लाना सुखदायक होगा, पर यह तो सुखदायक बनेने लगा,  अदमी की जगह डिंबों ने ले लिया घर अब घर नहीं, कचरों का दबा बन गया सामानों की दया पर अदीमी निर्भर हो गया पहले अदीमी अंधार था, अब बेघर हो गया घर से बाहर हो गया । ठीक था पहले सामान कम था अदीमी था, आदमीयत भी थी पर सामानों के राज में आदमी गरीब हो गया उसकी आदमीयत, प्यार –मुहबबता खोखली हो गई डिबम्बो, कार्टून की तरह खाली हो गई अब सब शब बन गये,  चलते फिरते शरीर से मानों प्राण निकल गये ।

सबके बाद भी तुम हो / अन्नपूर्णा महांति

रचनाकार:  अन्नपपूर्णा मोहंती (1953) जन्मस्थान:  माधवपुर, केन्द्रपाड़ा कविता संग्रह:  रूटि और ऋत (1987),पाद-स्पर्श (1989),नीलनदीर लुह(1991), नीलमेघ(1993), निशब्द वात्या (1999),एकाएका (2001) ,सारा स्वप्न (2003), मुहूर्तन्कर मोक्ष (2008), देह-विदेह (2009), यंत्रस केते निजर (2011),माटि कुंठेई (2011), अनुवाद :- सिंधी से ओड़िया (याद का ही प्यार जी –श्री कृष्ण खोटवानी ) हवा को मना कर दिया है तुम्हें नहीं दे मेरे शरीर की गंध बादल को मना किया है सारे आंसू धारा बनकर तुम्हारे आगे बरसेंगे नहीं। समय की ग्रीष्म यात्रा सभी समय बराबर नहीं होते  मेरा अपने आप पर अखंड -विश्वास तुम क्यों सहन करोगे मेरे लिए दुखों का श्रावण ! भावनाओं के दिन थे नहीं लौटेंगे हृदय के रक्तरंजित दिन स्वामी और संतान से छुपाकर जीवन के जलते हुए मध्यान्ह में आज भी नहीं है कि तब भी नहीं थे वे तुमको कभी भी नहीं मिल सकते जिंदा रहने के लिए अनाहत फाल्गुन दूर में हो तो रुक जाओ एक तीव्र इच्छा छटपटा रही है स्पर्श की प्यास लेकर दृष्टि के लिए चपलता के लिए अतृप्त दीर्घ प्यास लेकर जीवन से और एक जीवन को प...

आंधी / हर प्रसाद परिछा पटनायक

रचनाकार:  हर प्रसाद परिछा पटनायक (1953) जन्मस्थान:  बिक्रमपुर, गंजाम कविता संग्रह:  एका एका सन्यासी (1981), अथय सूर्य (1992), आयुष्मान समय (1995), सबु अंधार आजि रातिरे (1996) सनातन, तुमने आँधी देखी है, ईश्वर के प्रकोप को ? ठीक तीन बजे चहल-पहल से भरा सारा शहर चिंता से थम गया पूरी तरह दूर-दूर तक, दिग्वलय तक दिखने लगा पीला रंग पेड़- पौधे हो गए स्थिर फोन के खंभों की तरह अंधेरें जैसे बुरी तरह थम गया समय उसके सामने समय कितना बुद्धू और लाचार साँय-साँय के कोलाहल में उड़ गए पक्षी सभी दिशाओं में रोने लगी गायें बच्चों की तरह उस अंधेरे आतंक में इधर-उधर भागी, मगर लौटा दिया पेड़ों ने गुंबद की तरह सभी उठे आकाश को लौटकर चले गए पूर्व दिशा में असमाप्त वेदना लहरों की तरह दौड़ी बंग सागर में। चिड़ियों की चहचहाहट मिली पानी के साथ तब भी हवा उनके पीछे भागी रेत, धूल, पेड़-पौधे, सूखे पत्ते छत, एस्बेस्टॉस, तंबू, लाइट पोस्ट जगह- जगह रिक्शे और केबिन उड़ने शुरु हुए हवा के साथ मतवाली चिड़ियों की तरह उड़ते हुए आए अस्त्र की तरह जिस किसी के रास्ते में । सनातन, तुमने कभी पवन देखी है, पवन क...

देवी / चंद्र मिश्र

रचनाकार:  चंद्र मिश्र (1952-?) जन्मस्थान: कविता संग्रह:  24वर्षर चंद्र मिश्र महर्षियों के वीर्य से निर्मित तुम्हारे शरीर के गोरे अंगों से छल-कपट के सारे वस्त्र उतारकर जीवन का बोझ ढोने में अक्षम मेरे कंधों पर सपनों के पंखों में तुम्हारे चरण निषिद्ध नायिकाओं के दुस्साहस निर्मित अव्यर्थ अस्त्र घोप दिए मेरे हृदयहीन छाती में रतिनिबिड़ आलिंगनबद्ध तुम्हारे सशक्त हाथों ने कसकर पकड़ रखा है चिरकाल चिंता में डूबे मेरे सिर को, मैं वीभत्स नपुंसक मेरे भीतर खोज रही हो तुम एक समर्थ प्रेमी। कपटी राक्षस के खोल के अंदर मैं हूँ धूर्त महिषी की हीन-मन्यता देवी अहंकार का प्रत्येक अट्टहास मेरी असामर्थ्यता का गुप्त रूदन, भय और संदेह मेरे दो नुकीले सींग, अपने आप पर गहरा अविश्वास ही मेरा अत्याचारी सैन्यसामंत । तुम आत्मप्रत्यय की तरह अकेले और अनासक्त। मैं बर्बर आक्रमक की ग्लानि जैसे पलातक  तुम सत्य की तरह नग्न जिसके अमरत्व के वर और कवच में ढका है मैने अपना ध्वजभंग । मैं दूसरों को नंगा कर सकता हूँ रात के अंधेरे में किंतु डरता हूँ स्वयं को निर्वस्त्र करने से यहाँ तक स्वयं के सामने भी। राक्...

नष्ट नारी / अपर्णा महांति

रचनाकार:  अपर्णा महांति (1952) जन्मस्थान:  कपालेश्वर,केंद्रपाड़ा-754211 कविता संग्रह:  अव्यक्त आत्मीयता (1991),असती (1993) अपर्णा पहचानो एक साधारण नारी के स्वाक्षर। पलक झपकते ही मिटाने से मिट जाएंगे पढ़ने बैठोगे तो पढते रह जाओगे युग -युग तक आदि काल से आजतक.... कितनी माया कितना मोह कितना दाह कितना द्रोह कितने आंसू कितना लहू इतिहास के सजीव शिलालेखों में कलात्मकता से अंकित कई साहसी नष्ट-नारियों के कुछ अक्षर तैंतीस करोड़ देवी- देवताओं के सामने दुर्गा के निर्वस्त्र होने से लेकर अहिल्या का पत्थर बनना सीता की अग्नि परीक्षा और पाताल में प्रवेश पांचाली का जुए में बाजी लगना आदि जाने सुने असाधारण असहायता के उदाहरण । गार्गी के सिर कलम करने की धमकी खना की कटी जीभ का कारुण्य रूप कंवर का जिंदा सती होना बनवार का सामूहिक बलात्कार तसलीमा की मौत का फतवा अपनी आँखों से देखकर पिता के निर्मम प्रहार से क्षतविक्षत माँ के शरीर को सहलाते समय भगिनी की जलते चर्म की आग बुझाते समय निरापद अँधेरे में स्व-शून्यता की दिशा में मुँह करके दौड़ते हुए बेटी को लौटा लाने में लगी रक्ताक्त ठोकर । प्रेमी...